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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

शास्त्रार्थरसिकास्तज्ज्ञा ज्ञातलोकपरावराः । हेयोपादेयवेत्तारो यथाप्राप्ताभिपातिनः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञ शास्त्रों के अर्थों में बड़ा ही रस लेते हैं, उत्तम और अधम लोकों को जानते हैं, कौन वस्तु छोड़ने योग्य है और कौन छोड़ने योग्य नहीं है इसको भलीभाँति जानते हैं तथा समयपर जो भी कुछ प्रारब्धानुसार प्राप्त हो जाय, उसका अनुवर्तन कर लेते हैं