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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 11–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 1, verses 11–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 11-13

संस्कृत श्लोक

तस्थावकर्मकृत्तूष्णीं संशयानो गृहे तदा । अग्निवेश्यो विलोक्याथ पुत्रं कर्मविवर्जितम् ॥ ११ ॥ अग्निवेश्य उवाच । प्राह एतद्वचो निन्द्यं गुरुः पुत्रं हिताय च । किमेतत्पुत्र कुरुषे पालनं न स्वकर्मणः ॥ १२ ॥ अकर्मनिरतः सिद्धिं कथं प्राप्स्यसि तद्वद । कर्मणोऽस्मान्निवृत्तेः किं कारणं तन्निवेद्यताम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

घर आकर वह सन्ध्यावन्दन आदि कोई कर्म नहीं करता था, बल्कि उनमें अनेक तरह के सन्देह करने लगा । अपने पुत्र को यों कर्मरहित अतएव निन्द्य देखकर अग्निवेश्य ने उसके हित के इस प्रकार के जैमिनिसूत्र से स्वर्ग ही मोक्ष है, ऐसा मालूम पड़ता है। इस प्रकार का मोक्ष ज्योतिष्टोम आदि कर्मों सेही हो सकता है, अतः मीमांसक-मत के अनुसार क्या कर्म ही मोक्ष का कारण है ? ऐसा प्रथम प्रश्न का आशय है । "न कर्मणा न प्रजया”, "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः", 'ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति" इत्यादि श्रुतियों से यह ज्ञात होता है कि मुक्ति का ज्ञान से अतिरिक्त दूसरा कोई भी कारण नहीं हो सकता, अतः उपनिषत्‌मत के अनुसार क्या ज्ञान ही मोक्ष का कारण है ? ऐसा द्वितीय कल्प का भाव है । कुर्वन्नेवेह कर्माणि", "विद्यांचाविद्यांच यस्तद्वेदोभय सह इत्यादि मन्त्रौ से उसके ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर कारण हैं, ऐसा ज्ञात होता है, अतः क्या ज्ञान-कर्म दोनों समुच्चयरूप से मुक्ति के कारण हैं ? यों तृतीय प्रश्न का आशय है। 8 यहाँ ज्ञान और कर्म का समुच्चय मोक्ष का हेतु है, ऐसा प्रतिपादन नहीं किया गया है, किन्तु पहले कर्मानुष्ठान द्वारा चित्त की शुद्धि होने पर ज्ञान होता है, तदनन्तर मुक्ति होती है, यों ज्ञान में ही साक्षात्‌ मुक्ति की हेतुता का प्रतिपादन किया गया है; इसलिए पक्षीका दृष्टान्त ज्ञान और कर्म के यौगपद्यांश में स्वरूपसमुच्चय में नहीं समझना चाहिए, किन्तु क्रमसमुच्चय में समझना चाहिए, क्योंकि प्रवृत्ति ओर निवृत्ति कर्तृत्व- अकर्तृत्व एक समय में नहीं हो सकती, इससे भी ज्ञान से पहले कर्मो की अस्तिता अर्थतः प्रतीत होती है । जैसे दर्पण में किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब पड़ने के पहले दर्पण का परिमार्जन और प्रकाश दोनों अपेक्षित होते हैँ क्योंकि उनके बिना उसमें प्रतिबिम्ब ही नहीं हो सकता, वैसे ही अविद्या-मल की निवृत्ति में चित्त की शुद्धि और प्रमाण से उत्पन्न होनेवाली शुद्धवृत्ति ये दोनों अपेक्षित हैं, क्योंकि अशुद्ध चित्तवाले को हजार बार श्रवण करने पर भी आत्मज्ञानरूप फल की प्राप्ति नहीं देखी जाती | लिए ये वचन कहे : हे वत्स, यह क्या कर रहे हो ? अपने कर्मो का पालन क्यों नहीं करते ? भला बतलाओ तो सही यदि कर्म न करोगे, तो तुम्हें सिद्धि कैसे प्राप्त होगी ओर यह भी बतलाओ कि तुम्हारी कर्मो में प्रवृत्ति क्यों नहीं होती ?