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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 1, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अगस्तिरुवाच । इत्युक्त्वा तात विप्रोऽसौ कारुण्यो मौनमागतः । तथाविधं सुतं दृष्ट्वा पुनः प्राह गुरुः सुतम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अगस्त्य ने कहा : भद्र, पिता से कह कर कारुण्य चुप हो गया, उस के पिता ने चुप-चाप बैठे हुए पुत्र से कहा