Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 1, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अग्निवेश्य उवाच ।
शृणु पुत्र कथामेकां तदर्थं हृदयेऽखिलम् ।
मत्तोऽवधार्य पुत्र त्वं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अग्निवेश्य ने कहा : प्रिय पुत्र, मैं तुमसे एक सुन्दर कथा
कहता हूँ, उसे सुनो । उसके अर्थ का मुझसे निश्चय करके तुम्हें जैसा अच्छा लगे वैसा करना