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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 19–25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 1, verses 19–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 19-25

संस्कृत श्लोक

सुरुचिर्नाम काचित्स्त्री अप्सरोगणउत्तमा । उपविष्टा हिमवतः शिखरे शिखिसंवृते ॥ १९ ॥ रमन्ते कामसंतप्ताः किन्नर्यो यत्र किन्नरैः । स्वर्धुन्योघेन संसृष्टे महाघौघविनाशिना ॥ २० ॥ दूतमिन्द्रस्य गच्छन्तमन्तरिक्षे ददर्श सा । तमुवाच महाभागा सुरुचिश्चाप्सरोवरा ॥ २१ ॥ सुरुचिरुवाच । देवदूत महाभाग कुत आगम्यते त्वया । अधुना कुत्र गन्तासि तत्सर्वं कृपया वद ॥ २२ ॥ देवदूत उवाच । साधु पृष्टं त्वया सुभ्रु यथावत्कथयामि ते । अरिष्टनेमी राजर्षिर्दत्त्वा राज्यं सुताय वै ॥ २३ ॥ वीतरागः स धर्मात्मा निर्ययौ तपसे वनम् । तपश्चरत्यसौ राजा पर्वते गन्धमादने ॥ २४ ॥ कार्यं कृत्वा मया तत्र तत आगम्यतेऽधुना । गन्तास्मि पार्श्वे शक्रस्य तं वृत्तान्तं निवेदितुम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

अप्सराओं में अत्यन्त सुन्दरी सुरुचि नामकी एक अप्सरा शी । वह मयूरं से आवृत्त हिमालय के शिखर पर बैठी थी, जहाँ पर कामसंतप्त किन्नरिर्यँ किन्नरों के साथ क्रीडा करती हैं और पापों का नाश करनेवाला श्रीगंगाजी का प्रवाह किलोंले मारता है उसने आकाश-मार्ग से जा रहे इन्द्र के दूत को देखा । सुरुचि ने दूत से कहा : महाभाग, आप कहाँ से आ रहे हैं, अब कहाँ जाते हैं ? वह सब कृपापूर्वक मुझसे किये । दूत ने कहा : सुन्दरी, आपने बड़ा अच्छा प्रश्न किया । मैं आपके प्रश्न का यथावत्‌ उत्तर देता हूँ। धर्मात्मा राजर्षि अरिष्टनेमि अपने पुत्र को राज्य देकर तप करने के लिए वन में गया । वह राजा गन्धमादन पर्वत पर तपस्या कर रहा हे । वही कार्य करके मैं आ रहा हूँ और अब वहाँ का वृतान्त कहने के लिए इन्द्र के पास जाता हूँ