Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 49–50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 10, verses 49–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 49,50
संस्कृत श्लोक
तस्य तादृक्स्वभावस्य समग्रविभवान्वितम् ।
संसारजालमाभोगि प्रभो प्रतिविषायते ॥ ४९ ॥
ईदृशः स्यान्महासत्त्वः क इवास्मिन्महीतले ।
प्रकृते व्यवहारे तं यो निवेशयितुं क्षमः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रभो, उस प्रकार के स्वभाववाले श्रीरामचन्द्रजी को समग्र वैभवों से परिपूर्ण यह संसाररूपी
जाल कृत्रिम और प्रतिकूल विष के समान प्रतीत हो रहा है ऐसे महामोह से मोहित श्रीरामचन्द्रजी को
संसार-व्यवहार में प्रवृत्त कराने के लिए इस भूमण्डल में कोई भी महाशक्तिशाली नहीं है