Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 10, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
मनसि मोहमपास्य महामनाः सकलमार्तितमः किल साधुताम् ।
सफलतां नयतीह तमो हरन् दिनकरो भुवि भास्करतामिव ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे भास्कर (सूर्य) अपने भास्करपनको इस पृथ्वी पर गिरनेवाले अन्धकारका नाशकर सफल बनाता
है, वैसे इस भूखण्ड में ऐसा कोई भी महामना समर्थ साधु पुरुष नहीं है, जो कि रामचन्द्रजी के मन में
रहनेवाले अनेकविध दुःखदायी मोहरूप अन्धकारका विनाश कर अपने साधुपनको सफल बनावे