Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verses 15–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 11, verses 15–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 15-17
संस्कृत श्लोक
सत्त्वावष्टब्धगर्भेण शल्येनेव हिमाचलम् ।
श्रितं सकलसेव्येन गम्भीरेण स्फुटेन च ॥ १५ ॥
सौम्यं समं शुभाकारं विनयोदारमानसम् ।
कान्तोपशान्तवपुषं परस्यार्थस्य भाजनम् ॥ १६ ॥
समुद्यद्यौवनारम्भं वृद्धोपशमशोभनम् ।
अनुद्विग्नमनानन्दं पूर्णप्रायमनोरथम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
शान्ति और विवेक के हेतु
सत्त्वगुण से सम्पन्न, सकलजनसेवनीय, असीम ओर व्यक्त आह्नादकता से युक्त श्रीरामचन्द्रजी विविध
प्राणियों से व्याप्त, कलायुक्त चन्द्र द्वारा सेवनीय, अपरिमित ओर स्फुट हिमसे युक्त हिमालय के तुल्य
दिखाई देते थे । उनका दर्शन बड़ा प्रिय लगता था, उनके शरीर के अवयव समविभक्त थे, आकृति बड़ी
भव्य थी, उनका शान्त ओर सर्वमनोहर शरीर पुरुषार्थलाभ के (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति के)
नितान्त योग्य था। वे बडे विनीत ओर उदार थे। यौवन का आरम्भ होने पर भी उनके शरीर में योवनोचित
चंचलता नहीं थी किन्तु वृद्धोचित शान्ति (गम्भीरता) शोभा दे रही थी, अविवेक के नष्ट होने के कारण
उनमें किसी प्रकार का उद्वेग नहीं था फिर भी उन्हें परमान्द प्राप्त नहीं हुआ था। देखते ही प्रतीत होता
था कि उनकी अभीष्ट प्राप्ति प्रायः सन्निहित ही है