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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 11, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

शत्रुघ्नं लक्ष्मणं चैव तथैव परवीरहा । आलिलिङ्ग घनस्नेहो राजहंसोऽम्बुजे यथा ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

शत्रुतापन राजा ने श्रीरामचन्द्रजी की ही नाईं लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी आलिंगन और चुम्बन किया