Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verses 29–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 11, verses 29–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
राजोवाच ।
पुत्र प्राप्तविवेकस्त्वं कल्याणानां च भाजनम् ।
जडवज्जीर्णया बुद्ध्या खेदायात्मा न दीयताम् ॥ २९ ॥
वृद्धविप्रगुरुप्रोक्तं त्वादृशेनानुतिष्ठता ।
पदमासाद्यते पुण्यं न मोहमनुधावता ॥ ३० ॥
तावदेवाऽऽपदो दूरे तिष्ठन्ति परिपेलवाः ।
यावदेव न मोहस्य प्रसरः पुत्र दीयते ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा दशरथ ने कहा : पुत्र तुम विवेकसम्पन्न हो एवं विविध कल्याणो के भाजन हो,
तुम अविवेकियों की नाई शिथिल बुद्धि से अपनी आत्मा को खिन्न मत करो | वत्स, वृद्धों की, ब्राह्मणों
की और गुरुजनों की आज्ञा का पालन कर रहे तुम्हारे जैसे जनों को ही पवित्र पद प्राप्त होता है, किन्तु
जो लोग मोह का अनुसरण करते हैं, उन्हें वह पद नहीं मिल सकता