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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 13, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

त्रयोदशः सर्गः श्रीराम उवाच । इयमस्मिन्स्थितोदारा संसारे परिकल्पिता । श्रीर्मुने परिमोहाय सापि नूनं कदर्थदा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार विषयों की असारता का प्रतिपादन कर विषय-सम्पादन में हेतुभूत श्री-धनसम्पत्ति- भी असार ही है, ऐसे प्रतिपादन करने के लिए इस सर्ग का आरम्भ करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, इस संसार में धनसम्पत्ति स्थिर और विविध सुखों की हेतु होने के कारण उत्कृष्ट है, ऐसा मूढ व्यक्तियों ने ही मान रक्खा है, वस्तुतः वह न स्थिर है, और न उत्कृष्ट ही है। वह नितान्त अनर्थ देनेवाली और मोह की हेतु है अर्थात वध, बन्धन, नरक आदि विविध क्लेश देती है, तनिक भी सुख नहीं देती अथवा प्राप्त होने पर मोह में डालती है, नष्ट होने पर क्लेश देती है या गर्हित धन ही देती है, विवेक नहीं देती

सर्ग सन्दर्भ

बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग सब मूढ़ों को प्रिय और सदा भोगरूपी अनर्थ को देनेवाली लक्ष्मी की विविध दोषों द्वारा निन्दा ।