Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 13, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
संभ्रमाभ्रादिपदवी विषादविषवर्धिनी ।
केदारिका विकल्पानां खेदायभयभोगिनी ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह
भय ओर भ्रान्तिरूपी मेघ के लिए पुरोवात (पूर्वी हवा) है, (जैसे पूर्वी हवा मेघ की वृद्धि की हेतु है, वैसे
ही श्री भी भय और भ्रान्ति की जननी है) विषादरूपी (खेदरूपी) विष को बढ़ानेवाली है, संशय और
संक्षोभ आदि की क्षेत्र है और दुःखदायक भय को पैदा करने में सर्पिणी है या यह खेद के लिए भयरूपी
भोग से (सर्पशरीर से) युक्त सर्पिणी है