Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 13, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
एषा हि पदमेकत्र न निबध्नाति दुर्भगा ।
दग्धेवानियताचारमितश्चेतश्च धावति ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अज्ञान से आग को पैर से कुचल कर जली
हुई कोई अभागिन एक जगह चरण नहीं रख सकती, किन्तु हाथ-पैर पटकती हुई इधर-उधर घूमती
है, उसकी चेष्टा एक सी नहीं रहती, वैसे ही श्री भी शस््रप्रतिपादित सदाचार से रहित पुरुष को
प्राप्तकर इधर-उधर घूमती-फिरती हे, कभी एक जगह स्थिर नहीं रहती