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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 13, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

गुणागुणविचारेण विनैव किल पार्श्वगम् । राजप्रकृतिवन्मूढा दुरारूढाऽवलम्बते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

दुःख से उपार्जित भी यह मूढ श्री राजाओं की प्रकृति के समान गुण ओर अवगुण के विचार के बिना ही जो कोई उसके समीप में रहता है, उसीका अवलम्बन कर लेती है अर्थात्‌ जैसे प्रायः मूढ राजा लोग धार्मिक गुणवानों के साथ प्रीति नहीं करते, जिस किसी समीपस्थ के साथ प्रीति कर लेते हैं, वैसे ही दुःख से उपार्जित भी यह श्री गुणवान्‌ धार्मिकं के ही उपभोग के लिए नहीं होती, किन्तु गुण ओर अवगुणों के विचार के बिना जिसको समीप में पाती है उसी से लिपट जाती है