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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 13, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

कर्मणा तेनतेनैषा विस्तारमनुगच्छति । दोषाशीविषवेगस्य यत्क्षीरं विस्तरायते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जिन कर्मो का फल धन, राज्यलाभ आदि ओर लोभ, हिंसा, मिथ्याभाषण आदि दोषरूप सर्पविष के वेगोके विस्तार के लिए होता है उन्ही युद्ध, जुआ, व्यापार आदि कर्मो से यह बढती है; यज्ञ, दान आदि से नहीं, उनसे तो बढ़ने के बदले घटती है, क्योकि उनमें इसका व्यय होता हे