Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 14, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
रूपमायुर्मनो बुद्धिरहंकारस्तथेहितम् ।
भारो भारधरस्येव सर्वं दुःखाय दुर्धियः ॥ १४ ॥
अविश्रान्तमनापूर्णमापदां परमास्पदम् ।
नीडं रोगविहङ्गानामायुरायासनं दृढम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
दुर्बुद्धि पुरुष के लिए आयु, मन, बुद्धि, अहंकार तथा चेष्टा ये सब भारवाहक के भार के समान दुःखदायक
हैं। यह आयु श्रमनिवृत्तिसे रहित, पूर्णकामता से शून्य, आपत्तियों के घर और रोगरूपी पक्षियों का
घोंसला है, इससे केवल सदा परिश्रम ही प्राप्त होता हे