Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 14, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
प्रत्यहं खेदमुत्सृज्य शनैरलमनारतम् ।
आखुनेव जरच्छुभ्रं कालेन विनिहन्यते ॥ १६ ॥
शरीरबिलविश्रान्तैर्विषदाहप्रदायिभिः ।
रोगैरापीयते रौद्रैर्व्यालैरिव वनानिलः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चूहा प्रतिदिन आलस्य का
त्यागकर लगातार धीरे-धीरे पुराने टीले को खोदकर नष्ट कर देता है। वैसे ही काल प्रतिदिन आलस्य
का त्यागकर धीरे-धीरे आयु को क्षीण कर रहा है । जैसे बिल में आराम कर रहे, विष द्वारा सन्ताप
देनेवाले भीषण सर्प वन की वायु का पान करतें हैं, वैसे ही शरीररूपी बिल में आरामसे बैठे हुए विष के
समान दाह (सन्ताप) देनेवाले भीषण सर्पो के सदृश घोर रोग जीव की आयु का पान करते हैं