Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 14, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
दिनैः कतिपयैरेव परिज्ञाय गतादरम् ।
दुर्जनः सुजनेनेव यौवनेनावमुच्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बिल्ली शीघ्र निगलने के लिए उत्कट अभिलाषापूर्वक
चूहे को देखती है वैसे ही मृत्यु शीघ्र निगलने के लिए उत्कट अभिलाषापूर्वक सदा जीव की आयु की
ताक में बैठी रहती है। जैसे बहुत भोजन करनेवाले पुरुष भक्षित अन्न को पचा डालता हे, वैसे ही तुच्छ
और गन्ध आदि गुण से युक्त वैश्यारूपी वृद्धावस्था जीव की शक्ति को क्षीण कर उसे जीर्ण कर देती
हे ॥१९.२०॥ जैसे कुछ ही दिनों में यह दुर्जन है, ऐसा जानकर सज्जन दुर्जन को अनादर पूर्वक छोड़
देता है, वैसे ही यौवनावस्था कुछ काल तक इस देह में वास कर थोड़े ही दिनों मे प्राणी को निरादर के
साथ छोड़ देती है