Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 14, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
विनाशसुहृदा नित्यं जरामरणबन्धुना ।
रूपं खिङ्गवरेणेव कृतान्तेनाभिलष्यते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे लम्पट लोग (महाविषयी पुरुष) सौन्दर्य के अभिलाषी होते हैं वैसे ही
विनाश का मित्र और वृद्धावस्था तथा मृत्यु का सहायक काल भी पुरुष और पुरुषकी आयु का सदा
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