Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 14, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ये तु विज्ञातविज्ञेया विश्रान्ता वितते पदे ।
भावाभावसमाश्वासमायुस्तेषां सुखायते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
क्या ब्रह्मवेत्ताओं की आयु भी व्यर्थ ओर क्लेशजनक है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
जो लोग ज्ञातव्य वस्तु को (ब्रह्म को) जान चुके हैं, असीम ब्रह्म में विश्रान्त हैँ ओर जिनके जीवन
मेँ लाभ, हानि ओर सुख-दुःख में चित्तवृत्ति समान रहती है, उन महापुरुषों की आयु ही सुखदायक
है