Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 14, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
संसारसंसृतावस्यां फेनोऽस्मिन्सर्गसागरे ।
कायवल्लयाम्भसो ब्रह्मञ्जीवितं मे न रोचते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस संसार से संभ्रमण में वल्लीरूप शरीर सृष्टिरूपी सागर में जल का विकार फेन रूप है,
जैसे सागर में जल का विकार फेन अस्थिर है, वैसे ही इस सृष्टि में यह शरीर अत्यंत अस्थिर है, इसलिए
इसमें मुझे जीवन अच्छा नहीं लगता