Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 14, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
अविश्रान्तमनाः शून्यमायुराततमीहते ।
दुःखायैव विमूढोऽन्तर्गर्भमश्वतरी यथा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे खच्चरी दुःख के
लिए ही गर्भ धारण करती है, (क्योंकि उसका पेट फाड़कर ही गर्भ निकलता है, ऐसी बात प्रसिद्ध है)
वैसे ही जिसके मन की तृष्णाओं का विनाश नहीं हुआ है, ऐसे मूर्ख पुरुष व्यर्थ आयु को दुःख के लिए ही
विस्तृत चाहता हे । व्यर्थ आयु को विस्तृत चाहना खच्चरी के गर्भधारण के समान दुःखहेतु ही है, यह
भाव है