Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अहमित्यस्ति चेद्ब्रह्मन्नहमापदि दुःखितः ।
नास्ति चेत्सुखितस्तस्मादनहंकारिता वरम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, यदि अहंकार रहता है, तो आपत्ति में मुझे दुख होता है और अहंकार नहीं रहता, तो मैं सुखी
रहता हूँ, इसलिए अहंकार रहित होना श्रेष्ठ है