Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अहंकारं परित्यज्य मुने शान्तमनस्तया ।
अवतिष्ठे गतोद्वेगो भोगौघो भङ्गुरास्पदः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
भोगसम्पत्ति से ही उद्बेगहीनता आदि क्यो नहीं होते इस शंका पर कहते हैं।
मुनिवर, मैं अहंकार को त्याग कर शान्तचित्त होकर, उद्वेग को छोड़कर बैठा हूँ। भोग-समूह,
भंगुर देह, इन्द्रिय, विषय आदि के अधीन हैं, इसलिए इनमें किसी एक के भी नष्ट होने पर उद्देग की
प्राप्ति दुर्वार होती है