Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
तमहंकारमाश्रित्य परमं चिरवैरिणम् ।
न भुजे न पिबाम्यम्भः किमु भोगान्भुजे मुने ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
वैरी उक्त अहंकार का अवलम्बन करके न तो मैं भोजन करता हूँ और न जल पीता हूँ। विविध भोगों के
भोग का तो कहना ही क्या है ?