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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

संसाररजनी दीर्घा माया मनसि मोहिनी । ततोऽहंकारदोषेण किरातेनेव वागुरा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बहेलिया वागुरा को (मृगों को बाँधने का फन्दा अर्थात्‌ जाल को) बिछाकर मृगों को पकड़ता है, वैसे ही अहंकाररूपी दोष ने संसाररूपी अँधेरी रात्रि मेँ फैलाकर मन को मोहित करनेवाली यह माया बिछा रखी है