Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
शमेन्दुसैंहिकेयास्यं गुणपद्महिमाशनिम् ।
साम्यमेघशरत्कालमहंकारं त्यजाम्यहम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अहंकार शमरूपी चन्द्रमा को निगलने के लिए राहूका मुँह है, गुणरूपी कमलों का विनाश करने के लिए
तुषाररूप वज्र है और सब भूता में समदर्शितारूपी मेघ के लिए शरद्ऋतु है अर्थात् जैसे चन्द्रमा को राहू
निगल जाता है जैसे कमलों को हिमवर्षा नष्ट कर देती है और शरद्-ऋतु मेघों का विध्वंस कर डालती
है, वैसे ही अहंकार शम, दया, दाक्षिण्य आदि गुण और सब पर समदृष्टि को नष्ट कर देता है, इसलिए
मैं इस अहंकार का त्याग करता हूँ