Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 16, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । दोषैर्जर्जरतां याति सत्कार्यादार्यसेवनात् । वातान्तःपिच्छलववच्चेतश्चलति चञ्चलम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

अहंकार के समान चित्त और मन भी सुखहेतु नहीं है, किन्तु दुःख हेतु ही हैं, ऐसा कहते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ह मुनिवर, महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है! ऐसा वचन हे, इसलिए सज्जनो (मुमुक्षुओं) द्वारा अवश्य करणीय महात्माओं की सेवा के विना काम आदि दोषों से चित्त शिथिलता को (चंचलता को अर्थात्‌ पुरुषार्थ साधन में अपटुता को) प्राप्त होता हे । चंचल चित्त वायुप्रवाह में पतित मयूर की पूँछ के अग्रभाग की नाई स्थिर नहीं रहता, इधर-उधर घूमता रहता हे । मन भी प्राणवायु के अधीन और चंचल है, ऐसा आगे कहेंगे

सर्ग सन्दर्भ

पन्द्रहर्वौँ सर्ग समाप्त सोलहवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्र द्वारा चित्त और मन के विविध दोषों का युक्तियों ओर दृष्टान्तो से विस्तारपूर्वक वर्णन |