Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
सर्वापदां निलयमध्रुवमन्तरस्थमुन्मुक्तमुत्तमगुणेन न संश्रयामि ।
यत्नादहंकृतिपदं परितोऽतिदुःखं शेषेण मां समनुशाधि महानुभाव ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अहंकार, उससे होनेवाले अनर्थ और उसके उच्छेद के फल का वर्णन कर अहंकार के
त्याग से उत्पन्न हुई अपनी श्रवणाधिकार-सम्पत्ति को कह रहे श्रीरामचन्द्रजी मुनि से उपदेश की
प्रार्थना करते हैं।
हे महानुभाव, सम्पूर्ण आपत्तियों के घर, शान्ति आदि गुणों से रहित हृदयस्थ अहंकार को में
आश्रय देना नहीं चाहता । मैं विवेककी दृढता से अहंकार रूपी लांछन को चारों ओर से दुःख से पूर्ण
समझता हूँ । महामुने, जो कुछ मेरे सम्पादन के योग्य अवशिष्ट रह गया है, उसके साथ मुझे
आत्मतत्त्व का उपदेश दीजिए