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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 16, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

नित्यमेव मुने शून्यं कदाशावागुरावृतम् । न मनो निवृतिं याति मृगो यूथादिव च्युतः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे अपने सजातीयं के झुण्ड से बिछुड़ा हुआ एवं बन्धन में पड़ा हुआ मृग सुख को प्राप्त नहीं होता, वैसे ही सब प्रकार से शून्य (मिथ्या) नित्य दुराशारूप रज्जु से वेष्टित मन कभी सुख को प्राप्त नहीं होता