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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 16, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

तरङ्गतरलां वृत्तिं दधदालूनशीर्णताम् । परित्यज्य क्षणमपि हृदये याति न स्थितिम् ॥ ५ ॥ मनो मननविक्षुब्धं दिशो दश विधावति । मन्दराहननोद्धूतं क्षीरार्णवपयो यथा ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुने, तरंग के समान चंचल वृत्ति को धारण कर रहा मेरा मन स्थूल और सूक्ष्म अवयवो के छेद के सिवा एक क्षण के लिए भी अपने स्थान पर स्थिरता को प्राप्त नहीं होता । विषयों के अनुसन्धान से विविध क्षोभ को प्राप्त हुआ मेरा मन मथनकाल में मन्दराचल के आघात से उच्चलित क्षीरसागर के जल के समान दसों दिशाओं में दोडता हे, किन्तु सुख कहीं पर भी नहीं पाता