Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
भीषयत्यपि धीरं मामन्धयत्यपि सेक्षणम् ।
खेदयत्यपि सानन्दं तृष्णाकृष्णेव शर्वरी ॥ १६ ॥
कुटिला कोमलस्पर्शा विषवैषम्यशंसिनी ।
दशत्यपि मनाक्स्पृष्टा तृष्णा कृष्णेव भोगिनी ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि मैं धीर हूँ, तथापि भयंकर काली रात्रि की नाई तृष्णा मुझे उरा रही है, विवेकरूपी
चक्षु से सम्पन्न हूँ फिर भी अन्धा बना रही हे ओर आनन्दस्वभाव हूँ तो भी दुःख दे रही है । हजारों
कुटिलताओं से पूर्ण, अंशतः सुख देनेवाले विषयों के लाभ से युक्त और परिणाम में वैर बन्धन आदिरूप
विषय देनेवाली यह तृष्णा तनिक स्पर्श होने पर ही काली नागिन की नाई ईस लेती है अर्थात् मोह में
डाल देती है