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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

भिन्दती हृदयं पुंसां मायामयविधायिनी । दौर्भाग्यदायिनी दीना तृष्णा कृष्णेव राक्षसी ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

पुरुषों के हृदय को भेदन करनेवाली, बन्धन, रोग आदि की या सारे प्रपंच की उत्पादक, दुर्भाग्य देनेवाली ओर दीनता से पूर्ण यह तृष्णा काली राक्षसी के सदृश है