Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
तन्द्रीतन्त्रीगणैः कोशं दधाना परिवेष्टितम् ।
नानन्दे राजते ब्रह्मंस्तृष्णा जर्जरवल्लकी ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्,
अनेक तन्त्रियों (तारों) और नाड़ियों से वेष्टित शरीर को धारण करनेवाली तृष्णा निरतिशय परमानन्द
के लिए उपयुक्त नहीं है, अतः यह जीर्ण तुम्बीसे युक्त वीणा हे । तात्पर्य यह है कि जैसे आलस्यवश
अन्य तुम्बीका सम्पादन न करने के कारण विच्छिन्न तन्त्रियों से सम्पन्न वीणा उत्सव आदि मांगलिक
कार्यो के लिए उपयुक्त नहीं होती, वैसे ही यह तृष्णा भी परमानन्द के लिए उपयुक्त नहीं हे