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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

नित्यमेवातिमलिना कटुकोन्माददायिनी । दीर्घतन्त्री घनस्नेहा तृष्णा गह्वरवल्लरी ॥ २० ॥ अनानन्दकरी शून्या निष्फला व्यर्थमुन्नता । अमङ्गलकरी क्रूरा तृष्णा क्षीणेव मञ्जरी ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

नित्य अतिमलिन, परिणाम में दुःखप्रद उन्माद को देनेवाली, दीर्घं तन्त्रियोँ से युक्त तथा विषयों में घनीभूत स्नेह करनेवाली तृष्णा पर्वत की गुफा में उत्पन्न लतारूप ही है अर्थात्‌ पर्वत गुफा में एक प्रकार की लता होती है, वह सूर्य के किरणों के न मिलने से अत्यन्त मलिन रहती है, उसका सेवन करने से परिणाम में उन्माद आदि दुःखप्रद व्याधियाँ होती हे ओर वह अत्यन्त विस्तृत होती है । इसीलिए तृष्णा ओर उसकी समानता हे । जैसे आम्र आदि उन्नत वृक्षों की शाखापर स्थित, सूख जाने के कारण अनेक कण्टको से आकीर्ण, पुष्पशून्य ओर फलरहित क्षीण मंजरी आनन्दप्रद नहीं होती, वैसे ही यह तृष्णा न आनन्दप्रद है, सुखप्रद है ओर न फलप्रद है, किन्तु व्यर्थ-विस्तृत है, अमंगलकारिणी है और क्रूर हे