Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अनावर्जितचित्तापि सर्वमेवानुधावति ।
न चाप्नोति फलं किंचित्तृष्णा जीर्णेव कामिनी ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त को अपने वश में करने में असमर्थ वृद्ध वेश्या के समान तृष्णा प्रत्येक पुरुष के पीछे
दौडती है, पर उसे फल कुछ नहीं मिलता