Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
संसारवृन्दे महति नानारससमाकुले ।
भुवनाभोगरङ्गेषु तृष्णा जरठनर्तकी ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
अनेक प्रकार के शोक, मोह आदि रसों से परिपूर्णं इस
महान् संसारसमूह में भुवनरूपी विस्तृत नाट्यशाला मेँ तृष्णा वृद्ध नर्तकी है अर्थात् करुण, हास्य ओर
बीभत्स आदि रसों से युक्त नृत्यशाला में स्थित वृद्ध वेश्या के समान तृष्णा हे