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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

अन्तर्दाहप्रदायिन्या समूढरसमार्दवः । पङ्क आदित्यदीप्त्येव शोषं नीतोऽस्मि चिन्तया ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे ताप पहुँचानेवाली सूर्य की किरणें कीचड़ के रस ओर मृदुता का अपहरण करके कीचड़ को सूखा देती हैं, वैसे ही अन्तःकरण को सन्तप्त करनेवाली चिन्ताने मेरे रस ओर मृदुता का हरण कर या मुझे विनय ओर दाक्षिण्य से शून्य कर सूखा दिया है अर्थात्‌ उक्त चिन्ताने मेरे विनयादि को नष्ट कर मुझे नीरस और कठोर बना दिया हे