Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
यन्न शक्रोति तत्रापि धत्ते ताण्डवितां गतिम् ।
नृत्यत्यानन्दरहितं तृष्णा जीर्णेव नर्तकी ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
तृष्णा जीर्णं नर्तकी के समान जिस कार्य के साधन मेँ अशक्त हे,
(नर्तकी के पक्ष में) जहाँ जाने में असमर्थ है, वहाँ भी ताण्डवगति धारण करती है और उत्साह न होने
के, निर्बल होने के कारण आनन्दरहित नृत्य करती है