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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

प्रयच्छति परं जाड्यं परमालोकरोधिनी । मोहनीहारगहना तृष्णा जलदमालिका ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

क्षण में पाताल में जाती है, क्षण मेँ आकाश की ओर उडती है, क्षण में दिशारूप निकुंजों में घूमती है, इसलिए यह तृष्णा हृदयरूपी कमल में रहनेवाली भँवरी है ॥३ १॥ संसार में जितने दोष हैं उनमें एक तृष्णा ही दीर्घ काल तक दुःख देनेवाला दोष है, जो अन्तःपुर मेँ रहनेवाले को भी भीषण संकट में डाल देती है ॥ ३ २॥ परम-आत्मतत्तवप्रकाश के साथ विरोध करनेवाली मोहरूप निहार से निविड मेघमालारूपी तृष्णा केवल जडता ही प्रदान करती है । मेघमाला भी सूर्यप्रकाश की विरोधिनी है, निहार से पूर्ण होती है और शेत्यरूप (शीतलतारूपी) जडता की दात्री है । अतः तृष्णा ओर मेघमालिका का साम्य उचित ही हे