Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
एकैव सर्वभुवनान्तरलब्धलक्ष्या दुर्लक्ष्यतामुपगतैव वपुःस्थितैव ।
तृष्णा स्थिता जगति चञ्चलवीचिमाले क्षीरोदकाम्बुतरले मधुरेव शक्तिः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
तृष्णा कैसे विस्तीर्ण है, कैसे दुर्लक्ष्य है और कैसे एक है ? क्योकि आश्रय, विषय ओर वाचक शब्द
के भेद से आशा, काम, लोभ आदिरूप से तृष्णा भिन्न भिन्न है, ऐसी आशंका कर उक्त अर्थ का
दृष्टान्तपूर्वक प्रतिपादन करते हैं।
जैसे रसन" इन्द्रिय के रूप से शरीर में विद्यमान सब जलों के मध्य में (जल सामान्यमें)
रहनेवाली एक ही माधुर्यशक्ति (नदी, समुद्र आदि में गिरने से) क्षीर, (गलाने से) उदक, (शब्द
करने से) अम्बु, इस प्रकार क्रिया और वाचक शब्दों के भेद से विभिन्न चंचल तरगों से संकुल जल
में स्थित होकर दुर्लक्ष्य होती है, अर्थात् एक ही है ऐसा उसका ज्ञान नहीं होता, वैसे ही शरीर में
विद्यमान तृष्णा एक होती हुई भी सम्पूर्ण भुवनों के भोग्य पदार्थों में व्याप्त होकर व्यवहार में दुर्लक्ष्य-
सी प्रतीत होती है- देहस्थित तृष्णा ने ही आशा, काम और लोभ का वेश धारण किया है, ऐसा स्पष्ट
प्रतीत नहीं होता