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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । आर्द्रान्त्रतन्त्रीगहनो विकारी परिपातवान् । देहः स्फुरति संसारे सोऽपि दुःखाय केवलम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

तृष्णा भले ही दुःख की कारण हो, पर 'जीवन्नरो भद्रशतानि पश्येत्‌“ (जीवित पुरुष अनेक मंगलो को देखता है) इस न्याय से भी शरीर युख-भोग का स्थान है, ऐसी प्रसिद्धि है ओर शरीर पर सवका अतिशय प्रेम भी देखा जाता है, इसलिए शरीर सुख का कारण है, ऐसी शंका करके शरीर भी दुःख का ही कारण है, ऐसा उपपादन करते है। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : महर्षिजी, गीली आँतों (पेट में स्थित मल, मूत्र आदि की थैलियों) और नाडियों से व्याप्त परिणामशील और मरणधर्म जो शरीर संसार में सबके सामने प्रकाशित हो रहा है, वह भी केवल दुःखभोग के लिए ही हे । अर्थात्‌ मल, मूत्र, शुक्र ओर शोणित से आद्र नाड़ियों से परिव्याप्त, विविध प्रकार के विकारों से युक्त और पतनशील यह जीवदेह केवल दुःखभोग के लिए प्रकाशित हो रही हे

सर्ग सन्दर्भ

सत्रहवाँ सर्ग समाप्त अठारहवाँ सर्ग आधि, व्याधि आदि अनेक क्लेशों तथा जरा-मृत्यु से ग्रस्त अभिमान ओर तृष्णा के मूलकारण शरीर की निन्दा ।