Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अज्ञोऽपि तज्ज्ञसदृशो वलितात्मचमत्कृतिः ।
युक्त्या भव्योऽप्यभव्योऽपि न जडो नापि चेतनः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
युक्तिमार्ग का अवलम्बन करने पर स्पष्टरूप से ज्ञात होता है किं यह जीव शरीर दो
रूपवाला हे । प्राण आदि चार कोशों का आधार होने के कारण जिसमें आत्मचमत्कृति (अध्यस्त-
चैतन्यतादात्म्य) लिपटी-सी है, ऐसा यह शरीर अज्ञ होने पर भी अभिज्ञ के समान ओर अभव्य होने पर
भी भव्य के समान प्रतीत होता है यह न तो जड है ओर न चेतन ही है ([>))