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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

वेगं सरोद्धुमुदितो वात्ययेव जरत्तृणम् । नीतः कलुषया क्वापि तृष्णया चित्तचातकः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि मैं अपनी चपलता को रोकने के लिए धर्ममेघा समाधि आदि में तत्पर हूँ, तथापि जैसे आँधी जीर्ण तृण को कहीं अन्यत्र ले जाती है, वैसे ही कलुषित तृष्णा ने मेरे चित्तरूपी चातक को कहीं अन्यत्र-अयोग्य विषय - में ही प्राप्त करा दिया है