Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 19–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verses 19–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
पङ्क्तिबद्धेन्द्रियपशुं वलत्तृष्णागृहाङ्गनम् ।
रागरञ्जितसर्वाङ्गं नेष्टं देहगृहं मम ॥ १९ ॥
पृष्ठास्थिकाष्ठसंघट्टपरिसंकटकोटरम् ।
आन्त्ररज्जुभिराबद्धं नेष्टं देहगृहं मम ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इस देहरूपी अहंकार के घर में इन्द्रियरूपी
पशु कतार बाँधकर खड हैँ, तृष्णारूपी गृहस्वामिनी (घर की मालकिन) वार बार इधर उधर घूम रही है,
कामदेवरूपी गरु आदि रंगने के पदार्थो से सब अवयव रंगे गये हैं, इसलिए यह देह मुझे अभीष्ट नहीं है ।
पीठ की हड्डीरूपी (रीढरूपी) सहतीरों के परस्पर मिलने से जिसके भीतर बहुत थोड़ा स्थान रह गया
है, ओंतरूपी रज्जु ओं से बेधा हुआ देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं हे