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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 24–27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verses 24–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 24-27

संस्कृत श्लोक

मलाढ्यविषयव्यूहभाण्डोपस्करसंकटम् । अज्ञानक्षारवलितं नेष्टं देहगृहं मम ॥ २४ ॥ गुल्फगुग्गुलुविश्रान्तजानूर्ध्वस्तम्भमस्तकम् । दीघदोर्दारुसुदृढं नेष्टं देहगृहं मम ॥ २५ ॥ प्रकटाक्षगवाक्षान्तः क्रीडत्प्रज्ञागृहाङ्गनम् । चिन्तादुहितृकं ब्रह्मन्नेष्टं देहगृहं मम ॥ २६ ॥ मूर्धजाच्छादनच्छन्नकर्णश्रीचन्द्रशालिकम् । आदीर्घाङ्गुलिनिर्व्यूहं नेष्टं देहगृहं मम ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुने, यह देहरूपी गृह दोषपूर्ण विषयसमूहरूपी बर्तनों ओर अन्यान्य सामग्रियों से ठसाठस भरा हुआ है और अज्ञानरूपी क्षार से जर्जर है, भला बतलाइए तो सही, यह हमारा अभीप्सित केसे हो सकता है ? टखने (एडी के ऊपर की गोठ) रूपी आधारकाष्ठ स्थित पिण्डलीका घुटनारूप मस्तक जिसके स्तम्भका मस्तक है, लम्बी लम्बी दो भुजाएँरूपी आडी लकड़ियों से अत्यन्त दृढ यह देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है । ब्रह्मन्‌, जिसमें ज्ञानेन्द्रियरूपी झरोखों के भीतर प्रज्ञारूपिणी गृहस्वामिनी क्रीडा कर रही है, चिन्तारूपी अनेक पुत्रयो जिसमें विद्यमान हैं, ऐसा देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है । सिर के केशरूपी छादन (छाजन-छने की घास-फूस) से आच्छादित, कर्णङूपी शोभाशाली चन्द्रशालाओं से (घूर ऊपर के कमरों से) युक्त तथा लम्बी लम्बी अगुलीरूपी काठके चित्रों से सुसज्जित देहरूपी घर मुझे पसन्द नहीं है