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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

सर्वाङ्गकुड्यसंघातघनरोमयवाङ्कुरम् । संशून्यपेटविवरं नेष्टं देहगृहं मम ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसमें सम्पूर्ण अंगरूपी दीवारों में रोमरूपी निविड (खूब घने) जौके अंकुर उगे हैं और पेटरूपी छिद्र है, ऐसा देहरूपी घर मुझे नहीं चाहिए