Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 29–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verses 29–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 29-31

संस्कृत श्लोक

नखोर्णनाभिनिलयं सरमारणितान्तरम् । भाङ्कारकारिपवनं नेष्टं देहगृहं मम ॥ २९ ॥ प्रवेशनिर्गमव्यग्रवातवेगमनारतम् । वितताक्षगवाक्षं तन्नेष्टं देहगृहं मम ॥ ३० ॥ जिह्वामर्कटिकाक्रान्तवदनद्वारभीषणम् । दृष्टदन्तास्थिशकलं नेष्टं देहगृह मम ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसमें नखरूपी मकड़ियों के जाले तने हैं, कुन्ती की नाई भ्रमण, दीनता, कलह आदि करानेवाली क्षुधा जिसके अन्दर शोर मचाती है, जिसमें भीषण शब्द करनेवाला वायु सदा चलता रहता है, वायु का वेग भीतर प्रवेश करने ओर बाहर निकलने में सदा व्यग्र रहता है ओर इन्द्रियरूपी झरोखे सदा खुले हैं, इस प्रकार का देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं हे । उक्त देहरूपी घर के मुंहरूपी दरवाजे पर जिह्लारूप वानरी सदा डटी रहती है, इससे उसकी भीषणता ओर बढ़ जाती है, दाँतरूप हड्डी के टुकड़े स्पष्ट दिखाई पडते हैं, अतः यह देहगृह मुझे अभीष्ट नहीं हे