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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

त्वक्सुधालेपमसृणं यन्त्रसंचारचञ्चलम् । मनः सदाखुनोत्खातं नेष्टं देहगृहं मम ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

त्वचारूपी चूने के लेप से (पलस्तर से) चिकना हे, सम्पूर्ण सन्धिर्य इस घर के यन्त्र हैं, उनके संचार से (भ्रमण आदि से) यह चंचल है, मनरूपी सदा रहनेवाले चूहे ने इसे चारों ओर से खोदकर शिथिल ओर कूड़ा आदि से पूर्ण कर रक्खा है, अत: यह देहगृह मुझे नहीं जँचता