Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 33–35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verses 33–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 33-35
संस्कृत श्लोक
स्मितदीपप्रभोद्भासि क्षणमानन्दसुन्दरम् ।
क्षणं व्याप्तं तमःपूरैर्नेष्टं देहगृहं मम ॥ ३३ ॥
समस्तरोगायतनं वलीपलितपत्तनम् ।
सर्वाधिसारगहनं नेष्टं देहगृहं मम ॥ ३४ ॥
अक्षर्क्षक्षोभविषमा शून्या निःसारकोटरा ।
तमोगहनदिक्कुञ्जा नेष्टा देहाटवी मम ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षणभर मेँ मन्दहासरूपी दीपों की प्रभा से उज्ज्वल एवं आह्लाद से
देदीप्यमान और क्षणभर में अज्ञानरूपी अन्धकार से व्याप्त यह देहरूपी गृह मुझे भला नहीं लगता । यह
देह सम्पूर्ण रोगों का घर, बुढापे के कारण पडनेवाली झुर्रियों और केशों की सफेदी का नगर हे । इसमें
मानसिक क्लेशो का ही प्रधानरूप से साम्राज्य है, अत: उनसे इसकी गहनता का कोई ठिकाना नहीं हे,
इसलिए यह देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है । घोर अन्धकार से आच्छन्न दिशारूपी झाड़ियों से युक्त
भीतर से शून्य अनेक गुहाओं से पूर्ण यह देहरूपी महाअरण्य है, इसमें इन्द्रियरूपी भालू भयप्रदर्शन
करते हुए इधर उधर घूमते रहते हैं, अत: यह देहरूप अरण्य मुझे इष्ट नहीं है